वॉएजर-2 सौरमंडल के छोर तक पहुंचा

वॉएजर-2 (Voyager 2) सौरमंडल के आखिरी छोर पर पहुंचने वाला इतिहास का दूसरा अंतिरक्ष यान बन गया है. इसकों नाशा द्वारा 20 अगस्त 1977 को छोड़ा गया था और 41 वर्ष बाद यह सूर्य के चुंबकीय क्षेत्र से बाहर निकल गया है. इससे पहले 2012 में वॉएजर-1 ने इस सीमा को पार किया था.

वॉएजर-2 (Voyager 2) के बारे में

वायेजर द्वितीय एक अमरीकी मानव रहित अंतरग्रहीय शोध यान था जिसे वायेजर 1 से पहले 20 अगस्त 1977 को अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा द्वारा छोड़ा किया गया था. यह काफी कुछ अपने पूर्व संस्करण यान वायेजर 1 के समान ही था, किन्तु उससे अलग इसका यात्रा पथ कुछ धीमा है। इसे धीमा रखने का कारण था इसका पथ युरेनस और नेपचून तक पहुंचने के लिये अनुकूल बनाना. इसके पथ में जब शनि ग्रह आया, तब उसके गुरुत्वाकर्षण के कारण यह युरेनस की ओर अग्रसर हुआ था और इस कारण यह भी वायेजर 1 के समान ही बृहस्पति के चन्द्रमा टाईटन का अवलोकन नहीं कर पाया था। किन्तु फिर भी यह युरेनस और नेपच्युन तक पहुंचने वाला प्रथम यान था। इसकी यात्रा में एक विशेष ग्रहीय परिस्थिति का लाभ उठाया गया था जिसमे सभी ग्रह एक सरल रेखा मे आ जाते है. यह विशेष स्थिति प्रत्येक 176 वर्ष पश्चात ही आती है. इस कारण इसकी ऊर्जा में बड़ी बचत हुई और इसने ग्रहों के गुरुत्व का प्रयोग किया था। इसकी गति 57,890 किलोमीटर प्रतिघंटा है.

प्रमुख तथ्य

वॉयेजर द्वितीय के जीवन काल वर्धन हेतु उर्जा की बचत के लिये वैज्ञानिकों ने इसके उपकरण क्रमवार रूप से बंद करने का निर्णय लिया है। पिछले वर्षों में बंद हुए उपकरणों में कुछ मुख्य उपकरण इस प्रकार से हैं:

1998: स्कैन प्लेटफार्म और पराबैंगनी निरिक्षण बंद कर दिया गया

2012 : इसके एंटीना को घुमाने की प्रक्रिया (जायरो ऑपरेशन) बंद कर दिया जाएगा

2012 : डीटीआर प्रक्रिया बंद कर दी जायेगी।

2016 : उर्जा के सभी उपकरण बांट कर उपयोग करेंगे।

2020 : संभवतः उर्जा-उत्पादन बंद हो जायेगा

वॉएजर-2 नासा का सबसे लंबा चलने वाला मिशन है.

वॉएजर-2 एकमात्र अंतरिक्ष यान है जो सभी चार विशाल ग्रहों – बृहस्पति, शनि, यूरेनस और नेप्च्यून की यात्रा कर चुका है

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